कंटेंट विदाउट विश: दुनिया की मजबूरी और ईरान युद्ध की राजनीति
रूपम कुमारी —
वैश्विक राजनीति में कई बार ऐसे फैसले सामने आते हैं, जो देशों की वास्तविक इच्छा से नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबावों से तय होते हैं। आज ईरान से जुड़े संभावित युद्ध या टकराव के मुद्दे पर भी कुछ ऐसा ही माहौल दिखाई देता है। दुनिया के कई देश खुले तौर पर अमेरिका के रुख का समर्थन करते नजर आ रहे हैं, लेकिन यह समर्थन पूरी तरह स्वैच्छिक नहीं बल्कि परिस्थितियों से उपजा हुआ लगता है।
अमेरिका लंबे समय से वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत के कारण दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्ति रहा है। कई देशों की अर्थव्यवस्था अमेरिकी बाजार, डॉलर व्यवस्था और सुरक्षा गठबंधनों पर निर्भर है। ऐसे में जब अमेरिका किसी मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाता है, तो बहुत से देशों के सामने खुलकर विरोध करने का विकल्प सीमित हो जाता है। परिणाम यह होता है कि वे औपचारिक रूप से समर्थन तो देते हैं, लेकिन अंदर से उस संघर्ष का हिस्सा बनने के लिए तैयार नहीं होते।
ईरान के साथ संभावित टकराव के मामले में भी यही स्थिति दिखाई दे रही है। यूरोप, मध्य-पूर्व और एशिया के कई देश युद्ध के दुष्परिणामों से भलीभांति परिचित हैं। उन्हें डर है कि यदि संघर्ष बढ़ा तो तेल की कीमतें बढ़ेंगी, वैश्विक व्यापार प्रभावित होगा और क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ेगी। इसलिए वे युद्ध से बचने के पक्षधर हैं, लेकिन अमेरिका के दबाव और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों की मजबूरियों के कारण वे पूरी तरह अलग रुख भी नहीं अपना पा रहे हैं।
यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की उस सच्चाई को उजागर करती है, जहां कई बार देशों की नीतियां उनकी इच्छाओं से नहीं बल्कि शक्ति संतुलन से तय होती हैं। ईरान के मुद्दे पर भी दुनिया का बड़ा हिस्सा शायद शांति चाहता है, लेकिन वैश्विक राजनीति का समीकरण उन्हें “कंटेंट विदाउट विश” यानी बिना इच्छा के सहमति की ओर धकेल रहा है।
